Poetry – मदारी उर्फ़ मोदारी | शहरों ने जकड़ लिया | जवानी

Poetry : एक प्रकार का साहित्य है जो एक विचार व्यक्त करता है, एक दृश्य का वर्णन करता है या एक कहानी को शब्दों की एक केंद्रित, गीतात्मक व्यवस्था में बताता है. तो आइए जानते है कुछ कविताएं – मदारी उर्फ़ मोदारी | शहरों ने जकड़ लिया | जवानी और इंटरनेट पर

 

Poetry – मदारी उर्फ़ मोदारी


बचपन के दिन बहुत निराले बड़ा मजा आता एक मदारी खेल दिखाने संग में बंदर लाता डमरू बजाता बंदर नचाता खेल दिखाता बच्चे डराता हंसा हंसा कर पेट दुखाता घूम घूम कर पैसे जुटाता…

बचपन बदला हम भी बदले समय के संग संग खेल भी बदले पहले मदारी बंदर लाता आज मदारी अकेला आता खुद ही गाता खुद ही बजाता खुद नाचे जनता को नचाता राष्ट्रवाद का ढोंग रचाता बोल बोल कर भीड़ जुटाता अच्छे दिन के सपने दिखलाकर सुख छीन रात का भी लेता अच्छे का श्रेय खुद ले लेता बुरा ठीकरा चाचा पे फोड़ता देश मुसीबत में जो आता अज्ञात खोपचे में छुप जाता मीडिया बुलाता प्रेस कॉन्फ्रेंस कराता फूट फूटकर आंसू दिखाता आंसू दिखाता जनता को बनाता बना बनाकर वोट बनाता

आपस में लड़ाता वोट जुटाता कसम भारत माता की खाता

जुमले सुनाता खूब बहलाता बहला बहलाकर वोट जुटाता

राष्ट्रवाद की नाव पे बैठे धीरे-धीरे बाहर आता

बचपन के दिन बहुत निराले बड़ा मजा आता…. पहले मदारी बंदर लाता आज मदारी अकेला आता………

 

Poetry – दरिया


दरिया तुझसे नेह करूं करूं घड़ी दिन रात तू आवे सूं आस जगे करूं हिवड़े री बात तन मन तैरा मुझमें समाउ नहीं रेवे न्यारी बात अब दरिया दरिया नहीं रेवे अब होवे सागर री बात

पण दरिया तने इक बात कहूं कहूं मनड़े री बात तने खुद सूं ज्यादा प्रीत करूं तू करती भीतरघात तू दरिया जब मुझमें समावे मैं कर लूं आतमसात जब दरिया तुझ में समाउ रेवे दिन और रात

सागर तुझसे प्रीत करूं पलक घड़ी दिन रैन सागर प्रीतम की याद में पावे न उर को चैन आऊं कोसों मीलों चलकर आऊं दिन और रैन चट्टान पहाड़ से लड़कर आऊं तब होवे पीव से मेल

पर सागर तने इक बात कहूं कहूं मनडे री बात तने खुद सूं ज्यादा प्रीत करूं तू करता भीतरघात तुझ में मिलकर सागर कहाउं मानु तेरी बात पर तू नदी-नदी से प्रीत लगावे कैसे कर लूं तोहे आतमसात ।

 

Poetry – शहरों ने जकड़ लिया


रोजी रोटी की आड़ में शहरों ने जकड़ लिया अपनी और अपनों की चाह में गांवों ने पकड़ लिया ऐ मजबूरी और महामारी तुमने नजाकत तो दोनों की समझा दी मगर फिर वही मरीचिका हमसे न शहर न गांव चुना गया

आया है शहर से बुलावा अब फिर जाना होगा अटल मजबूरियों के आगे अदम घुटने टेकना होगा अव्वलन् तो नौकरी की भागदौड़ ने हमसे गांव छीने सानी यह अब नौकरी करने को भी गांव छोड़ना होगा

निकले थे सुकूं की तलाश में और सुकूं ही खो बैठे शून्य से शून्य तक की जिंदगी, पुल इकाई दहाई के बांध बैठे अरे रहने दो हमारे पत्थर ही कोहिनूर से बेहतर है तुम्हारे कोहिनूर की खोज में खामखां अमोलक पत्थर भी खो बैठे

छोटे कपड़ों और बड़ी दुकानों को हम शहर कह बैठे चलती गाड़ियों, उड़ते धुंए को हम विकास समझ बैठे ऊंची शिक्षा, फूहड़ता से लगता शहरों ने हमें समृद्ध बना दिया हकीकत यह कंगाल शहरों पर हम अनमोल गांव लुटा बैठे !

 

Poetry – जवानी


मिली जवानी उनको तो, कुर्बा वतन पर कर गए

कोई मिटा भगत बिस्मिल माटी पर

कोई आजाद वतन पर सो गए अमर तो है जवानी राझा-हीर महेन्द्र-मूमल, मारू ढोला की मगर इतिहास निराला है जो शबाब देश प्रेम पर लुटा गए।

मिली जवानी रानी को तुफानी गरजना गरजी, ले पवन संग दामोदर क्रूर कायरों पर बरसी, देख प्रलय को मंजर गौर गए कांप जबां हड़सन की फिसली, यह नार नहीं साधारण है मर्द क्रान्ति का असली।

तुम याद करो उस तेजपुंज उस विवेकानन्द की तरुणाई. जब पश्चिम कल्चर हावी था, भी भारतीय सभ्यता शरमाई.. तब उठा मशाल हिन्द संस्कृति की जग में जोत जलाई थी, तब गवली भारत माता मन ही मन इठलाई थी।

त्याग यौवन-सुख देश चुना, एटम शक्ति भारत का

स्वप्न चुना, कौन कहता मौवन कलाम ने खपाया था, थी दुनिया अचरज में जब बुद्ध हल्का मुस्कराया था। वो यौवन था या बचपन था,

बस बादल बरस बारह का था, बरस 1301 में खिलजी ने करी चढ़ाई थी, बचा मान पद्मिनी का चित्तौड़ी पाग बचाई थी।

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Poetry – इंटरनेट


ऐ दो दिन की नेटबन्दी तूने इतना तो बतलाया है माना खोया बहुतो ने चैनों सुख कइयों ने नींदों को खोया हैं नेट ना होने पर बार बार सोशल मीडिया पर अंगुलियों का चहलकदमी कर बेरंग लौट आना, मानो जिंदगी वेंटिलेटर पर आना, और जैसे ही होटल, रेस्त्रां, मॉल में जाना, जाते ही तपाक से “भैया wifi है क्या?” और “जरा पासवर्ड बतलाना!” और इसके बाद बुलेट ट्रेन की गति से सोशल मीडिया खंगालना;

जैसे बिना ऑक्सीजन दम का घुटना, जी का मचलना, मानो दम घुटन, जी मचलन से हल्की राहत पाना, या जिंदगी पल दो पल वेंटिलेटर से उतर आना। पर इंटरनेट को मूल आवश्यकता बनाने वालों, बतलाओ जरा, बिना नेट कितनों ने जीवन खोया हैं? जिंदगी इंटरनेट के साथ भी थी, यकीनन इंटरनेट के इतर भी होगी, तुम कहते संसाधन सुगमता ने जीवन आसां बनाया? पर जीवन को मकड़जाल की मकड़ी सा पंगु भी तो बनाया; सच कहते हैं लोग अब हो गई दुनिया मुट्ठी में, पर इसमें क्या उपलब्धि, इंसान कठपुतली के सिवा क्या बन पाया है?

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